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नसीबा भी क्या रंग लाया ! कहाँ लाके हमको मिलाया !

उस दिन मैं अपने पति को आखिरी बार एयरपोर्ट पर मिली… कोई आपकी आँखों के सामने दुनिया छोड़ कर जाए तो आपको पता होता है कि वो इंसान अब कभी वापिस नहीं आएगा लेकिन मुझे मिले सिर्फ उनके कपड़े, कुछ सामान और खूब सारा इंतज़ार| हर दिन सिर्फ इस भ्रम में बीतता कि शायद कप्तान शैलेश बदूरिआ वापिस आ जाएं और मेरी सूनी ज़िन्दगी में फिर से वही रंग भर जाएं | हमेशा कहते या तो मैं तिरंगा फेहरा के आऊंगा या तिरंगे में लिपटा हुआ…. लेकिन आऊंगा जरूर | खबर आयी कि शैलेश बदूरिया जैसे कई बहादुर सैनिक बम्बबारी में शहीद हो गए |

उनका शरीर तो वापिस ना ला सके लेकिन कप्तान शैलेश बदूरिया एक सच्चे सिपाही की तरह लड़े !

बस इतनी सी सांत्वना… और मेरी पूरी ज़िन्दगी टूटे हुए कांच के टुकड़ो जैसी… हर टूटा टुकड़ा दर्द की परछाइयों को और ज्यादा कर देता था |

पूरे 6 साल हो गए लेकिन मैंने वो जैकेट आज तक नहीं धोयी | ऐसा लगता था मानो इन 6 सालों में हर रोज टूट कर फिर से अपनों के लिए जुड़ी थी | जब भी टूटती तो उस जैकेट को पहन लेती और उनकी खुशबू से फिर महक जाती | शुरू-शुरू में सुहाना मेरी बेटी को समझाना बहुत मुश्किल था लेकिन अब उसके पापा आकाश में चमकता एक सितारा है |

दिन बीते.. साल बीते.. लोगो ने सलाहों से दिल के घाव को नासूर बना दिया | पूरी ज़िन्दगी कैसे गुजारेगी… तू अकेली है, अकेले ज़िन्दगी नहीं कट सकती… अपनी बेटी के बारे में सोचो, बाप के बिना ज़िंदगी किसी सजा से कम नहीं… लोगों का मुँह तो बंद किया जा सकता है उनकी बात को नज़रअंदाज़ करके लेकिन अपने माँ-बाप और घरवालों ने भी समझाना शुरू कर दिया | मैं तो अपने आप को संभाल लेती लेकिन जब मैं दूसरे बच्चों को अपने माँ-बाप के साथ खेलता देखती तो शैलेश की कमी और ज्यादा महसूस होती…अपनी 4 साल की बेटी सुहानी के लिए | आखिरकार मैंने दूसरी शादी कर ली और इस बात को सबसे ज्यादा सराहा मेरी सास ने | वो भी यही चाहती थी कि मैं एक नयी ज़िन्दगी शुरू करू | मैं ये नहीं चाहती थी कि सुहाना पूरी ज़िन्दगी पापा कहने को तरसे…

मेरी ज़िन्दगी में फिर एक बार खुशियों ने दस्तक दी | मेरी बेटी को उसका पिता और मुझे अपना हमसफ़र मिल गया लेकिन फिर वक़्त ने अपना पासा पलटा और मुझे मात देने की ठानी | और वो हो गया जिससे मेरी ज़िन्दगी में खुशियों की बरसात और दुःखों का सैलाब हाथ पकड़ साथ आ गए | शैलेश वापिस आ गए! सालों पाकिस्तानियों की कैद में रहकर, हर लम्हा प्रताड़ित होकर भी उन्होंने जीने की उम्मीद नहीं खोयी | सैनिक है… इतनी आसानी से हार नहीं मानते… और हर पल जेल से निकलने की ताक में रहते-रहते एक दिन उन्हें वहां से भागने का सुनहरा मौका मिला |

और वो जान बचाकर आज वापिस आ गए |

नसीब भी देखो.. कहाँ लाके हमको मिलाया… जब पहली बार उनके आने की खबर मिली तो पैरो तले जमीन निकल गयी… आप सोचो कोई दुनिया से चला गया इंसान वापिस आ जाएं तो कैसा महसूस होता है| अब ज़िन्दगी के ऐसे दोहराहे पर खड़ी हूँ जहां मेरी समझ काम करना बंद हो गयी | अब पूरी ज़िन्दगी अपनी नयी बसाई दुनिया में भी चैन से ना रह पाउंगी और ना ही इसे उजाड़ कर वापिस पुरानी ज़िन्दगी का हाथ थाम सकती हूँ ! कुछ नहीं पता ! क्या करुँ ?

चित्र स्त्रोत -Scroll.in,the week, pinterest,rediff.com, filmi keeday, lopscoop