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मेरी बहन ही थी मेरी खुशियों की कातिल

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मेरी ख़ुशी की कोई सीमा नहीं रही जब माँ ने बताया की निधि, मेरी छोटी बहन चार्टेड एकाउंटेंसी की तैयारी के लिए दिल्ली आ रही थी |

मैं तक़रीबन 6 साल से दिल्ली में अपने पति विनय के साथ रह रही थी | जैसे किसी को अपने परिवारजनों के आने से ख़ुशी होती हैं वैसे ही मेरा दिल फूले नहीं समां रहा था जब निधि घर आयी | एक बहन का एक बहन से अच्छा जोड़ीदार कोई और नहीं होता | कहने लगी दीदी मैंने लक्ष्मी नगर में एक हॉस्टल ढूँढ लिया हैं और मैं वही कमरा ले कर रहूँगी | मैंने कहा हट पगली, अपनी दीदी के होते हुई तू PG में क्यों रहेगी?  सोचना भी मत!

और इस तरह निधि मेरे घर रहने आ गयी | सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था, विनय भी हम दोनों का पूरा ख्याल रखते थे | पर धीरे-धीरे कुछ चीज़े मुझे अटपटी लगने लगी | जीजा-साली हंस के बात करते है, एक दूसरे से चुटकी लेते है -ये सब तो हर जीजा-साली का अधिकार है लेकिन मेरे घर में अहसास कुछ अलग हो रहे थे | उनकी आँखे, उनकी बॉडी लैंग्वेज बड़ी अजीब सी हो रही थी |

विनय का जाते-जाते निधि के हाथ को छू जाना, निधि का आँखे मटकाते हुए मुस्कुराना – मुझे सब साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा था लेकिन वो सोचते थे मुझे कुछ समझ नहीं | एक दिन निधि कहती -जीजाजी मुझे कार चलाना सिखाओ, अब दिल्ली आयी हूँ तो कार चलाना तो सीख़ू !

मुझे कार चलानी नहीं आती | और मैंने इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया | उसी रात निधि तैयार हो कर कमरे से बाहर आयी और बोली -चलो जीजाजी | मैंने बोला कहाँ जाना है ? कहती कार सीखने | मैंने कहा -रात को ? कहती रात को ट्रैफिक नहीं होता ना इसीलिए | विनय ने चाभी उठाई और दोनों नीचे चले गए |

ऊपर से मैंने देखा तो विनय निधि के गले में हाथ डाले हुए थे और निधि खिलखिला के हंस रही थी | वापिस आये तो विनय की शर्ट पर पिंक रंग लगा था | मैंने कहा ये क्या है ? अरे तुम्हारी बहन आइस-क्रीम खाने की जिद्द कर बैठी | मैंने गुस्से में कहा मेरे लिए नहीं लाये ? विनय कहते तुम ही तो तीन दिन पहले कह रही थी मुझे ज़ुकाम है | कितनी बार तो दोनों को देख रोना तक आ गया लेकिन इनकी हरकतें बढ़ती गयी |

गुस्सा, दुख, चिढ़ और पता नहीं कितनी भावनाएँ मेरे अंदर बह रही थी | जब पानी सर के ऊपर हो गया तो मैंने निधि को कहा तेरे एक्साम्स ख़त्म हो गए ना | माँ अकेली है तुझे घर जाना चाहिए | कहती नहीं दीदी, भोपाल में मेरा कोई फ्यूचर नहीं है, दिल्ली में ही जॉब करुँगी |

मेरा शक यकीन में बदल गया | एक दिन निधि इंटरव्यू के लिए गयी हुई थी और विनय रोज की तरह ऑफिस | थोड़ी एलर्जी की प्रॉब्लम थी तो मैं डॉक्टर के पास चली गयी | वहा गयी तो डॉक्टर इमरजेंसी में चला गया और मुझे वापिस लौटना पड़ा | घर आयी तो निधि और विनय दोनों के जूते बाहर पड़े थे | मैं बहुत हैरान हो गयी | चुपके से रूम में गयी तो मैंने वो देखा कि मेरे होश उड़ गए |

निधि की गोद में विनय का सर था | मैंने झट से दरवाजा खोला और दोनों पानी-पानी हो गए |

मेरी आँख से एक आंसू ना निकला बल्कि एक अलग हिम्मत मेरे अंदर आ गयी और मैंने कहा-निकलो यहाँ से ! तो निधि कहने लगी दी मैं तो… मैंने कहा इस घर से निकलो | निधि उठके जाने लगी |

मैंने विनय की ओर देखा – तुम भी निकलो इस घर से | किसी और औरत से ताल्लुक रखने वाला मेरा पति नहीं और मेरे पति से ताल्लुक रखने वाली मेरी बहिन नहीं |

उसी वक़्त मैंने इन दोनों को घर से निकाल दिया | ये घर मेरे नाम पर हैं | तलाक के पेपर को डाले हुए एक महीना हो गया हैं | आज उसकी तारीक हैं | मैं खुश हूँ कि मैंने ये फैसला लिया क्योंकि ऐसे आदमी को अपनी पूरी ज़िन्दगी दे देना एक बेवकूफी हैं और ऐसी बहन से रिश्ता रखना नासमझी हैं, शुक्र हैं मुझमे इतनी समझ आ गयी | ऐसे आदमी के लिए आंसू बहाना भी बेकार है और मैं उसके सुधरने का इंतज़ार क्यों करूँ? जो आदमी एक बार ऐसा कर सकता है वो दोबारा भी कर सकता है। और यह तो मेरे सामने था, पीठ पीछे ऑफिस में भी कुछ हो सकता है, कौन जाने? इस ज़बरदस्ती के बंधन से तोह मैं अकेली ही ठीक हूँ! हैना?

 

चित्र स्त्रोत -Sweeety high, te,storyline blog, husbandlife relationships.