सृष्टि की एक खुशाल शादी-शुदा ज़िंदगी थी |
क्या सचमुच ऐसा था ? सृष्टि के माता-पिता और उसके आस-पास की दुनिया को तो ऐसा ही लगता था | ख्याल रखने वाले सास-ससुर, एक प्यार करने वाला पति था फिर ऐसा क्या था जो हर बीतते दिन उसकी ज़िन्दगी को एक साइलेंट किलर की तरह मार रहा था | सृष्टि की शादी को तकरीबन 4 साल हो गए थे लेकिन घर में पति से सम्मान एक दिन भी नहीं मिला | हां लेकिन दुनिया के सामने सृष्टि के पति जैसा कोई नहीं, लोग तो यहाँ तक कहते कि उसे हर पल भगवान का शुक्रिया अदा करना चाहिए जो उसे ऐसा पति मिला | तो क्या था सृष्टि की अजीबोगरीब ज़िन्दगी का राज ? जहा घर में उसकी किस्मत ऐसी थी जैसे काली स्याही से लिखी हो लेकिन दुनिया वालो की नज़रो में उसकी ज़िन्दगी इंद्रधनुष के रंगो से सजी थी |
सास ससुर दूसरे शहर में रहते थे और पति रितेश की जॉब ट्रांसफर होने की वजह से वे अम्बाला आ गए थे जहा ऑफिस वालो की ही पूरी कॉलोनी बसी हुई थी | सबको पता था कि सृष्टि की ज़िन्दगी एक दम परफेक्ट है जो दुनिया को नहीं पता था वो था कि उसका पति किसी पागल से कम नहीं था | माफ़ कीजिये ऐसे शब्द का प्रयोग करना पड़ा लेकिन जब आप सृष्टि की पूरी कहानी से अवगत होंगे तो आप इससे ज्यादा भद्दा शब्द इस्तेमाल करने पर मजबूर हो जायेंगे |
उसके पति को छोटी सी बात पर गुस्सा आ जाता था और बड़ी से बड़ी बात पर कोई प्रतिक्रिया नहीं |
उसका ये अजीबोगरीब बर्ताव देख सृष्टि की तो जैसे समझ ही काम करना बंद कर रही थी | एक ही बात को 10 बार बोलना और हमेशा असमंजस में रहना | मामूली से निर्णय लेने में भी वो असमर्थ था |
रितेश – सृष्टि ये कपड़े मैले लग रहे हैं ना !
सृष्टि -हां बदल लो |
रितेश- ठीक तो लग रहे हैं, नहीं करता |
सृष्टि – जैसा आपको ठीक लगे |
रितेश- पर ये छोटे-छोटे दाग दिख रहे हैं तुझे, गंदे तो हैं बदल लेता हूँ |
सृष्टि -ठीक
रितेश- मन नहीं कर रहा,छोड़ो रहने देता हूँ |
फिर दरवाजे तक पहुंच उन्ही पैरों वापिस आ जाना “रोशनी में ज्यादा गंदे लग रहे है कपड़े,बदलने आया हूँ| इस तरह कि नाजाने कितनी बातचीत रोज सृष्टि और रितेश के बीच में होती थी | इन आदतों से तंग आ सृष्टि ने भी बस हां में हां मिलाना शुरू कर दिया था |
पता नहीं ऑफिस में काम कैसे करता था | घर-बाहर की कोई खबर नहीं | बस अपनी ही सुद्ध में रहता था | सृष्टि अपने माँ-बाप की एकलौती बेटी जिसने अपने झूठे बर्तन तक उठा के नहीं रखे थे आज सब्जी वाले से मोल-भाव करती थी | कभी कही घूमने जाते और सृष्टि का बस ये कहना कि मेरा आइसक्रीम खाने का मन नहीं है उसे इतना गुस्से में ला देता कि वो सृष्टि को छोड़-छाड़ घर आ जाता और अपने आप को कमरे में बंद कर लेता फिर घंटो तक बाहर ना निकलता और जब निकलता तो गाली-गलोच शुरू | और ऐसी-ऐसी बातें बोलना जो शायद सुनना मुश्किल हो जाता |
सृष्टि ने “बेवक़ूफ़” शब्द शायद इतनी बार सुन लिया था कि उसे लगने लगा था कि वो सचमुच बेवक़ूफ़ है |
सास को फ़ोन कर सब बताती तो सास कहती बेटा कुछ नहीं है, रितेश बहुत लाड़-प्यार से पला है और नयी-नयी शादी में अड़जस्टमेंट्स तो होती ही हैं |
सृष्टि अपने हम उम्र के लोगो की ज़िन्दगी को इतना खूबसूरत देख किसी को कुछ नहीं बताती थी बस यही दिखाती मैं बहुत खुश हूँ ताकि उसे किसी भी तरह की ज़िल्लत का सामना ना करना पड़े | सभी रिश्तेदार मुंबई में रहते थे तो आना-जाना कम ही होता था | लेकिन और अजीब बात ये थी कि जब रितेश उसके घर या उसके रिश्तेदारों से मिलता तो कुछ भी अजीब नहीं करता | बिलकुल एक सभ्य, नम्र स्वभाव का एक कुशल इंसान लगता | सृष्टि बस उसको देखती रह जाती कि क्या ये वही इंसान है जो बाजार से 4 चीज़े लाने को कहो और दो लाता ये कहकर की बाकी दो के नाम भूल गया |
उसका घरवालों के सामने आते ही एकदम विपरीत स्वभाव देख वो किसी को ये भी ना समझा पाती कि उसके साथ क्या हो रहा है | दरसल रितेश की मानसिक स्तिथि ठीक नहीं थी ये सृष्टि को तब पता चला जब वो मुंबई में एक मनोवज्ञानिक चिकित्सक से मिली | उसने बताया कि आपका पति ड्यूल पर्सनालिटी का शिकार है जिसमे एक ही इंसान के 2 व्यक्तित्व होते है |
ऐसे लोग आक्रोश में आकर किसी भी हद तक जा सकते है | डॉक्टर ने बताया इसका ट्रीटमेंट तो है मेन्टल हॉस्पिटल में लेकिन ये कभी पूरी तरह ठीक नहीं हो सकता |
अपने पति की इस बिमारी को बद से बदतर होता देख उसे ये तक लगने लगा कि वो भी कही ना कही ड्यूल पर्सनालिटी डिसऑर्डर का शिकार हो रही है | घर में आंसुओं का सैलाब और बाहर वालो के सामने झूठी खिलखिलाती मुस्कान | जब हज़ारो बार अपनी व्यथा बताने पर भी सास-ससुर ने उसकी एक ना सुनी तो सृष्टि रितेश को उसी डॉक्टर के पास ये कहकर ले गयी कि उसे अपना चेक-अप करवाना है | और वहां डॉक्टर ने रितेश की गंभीर हालात देख उसे वही एडमिट कर लिया |
चित्र स्त्रोत -Eyeem, Elitedaily, Videoblocks

