” अब ये किसके लिए परोस रही हो ?” नवीन ने रसोई में खाना बनाती आशा के कंधे पर हाथ रख कर पूछा | अरे नीतू आंटी के लिए ! बेचारे बूढ़े पति-पत्नी अकेले रहते है, अब दो लोगों के लिए क्या खाना बनाएगी, इसलिए देने जा रही हूँ |
आशा सालों से ही अपने पति के साथ किराए के मकान में रह रही थी | पति की पोस्टिंग जिस शहर में होती वही घर बसा लेते थे दोनों पति-पत्नी | आशा हमेशा से ही खुश-मिजाज, मिलनसार और मेहनती औरत थी | जिस घर में किरायेदार बन कर जाती, उस परिवार को नम्र स्वभाव से अपना बना लेती | कोई घमंड नहीं, जमीन से इतनी जुड़ी हुई थी कि दूसरे के घर के काम में हाथ बटाने में ज़रा संकोच ना करती – आंटी, आप छोड़ो मैं कपड़े सुखाने डाल देती हूँ |
नवीन हमेशा आशा को समझाता कि दुनिया में इतने अच्छे आदमी का मोल नहीं होता और शहरों में गरीब और अमीर में फर्क करते हैं तो थोड़ी दूरी बनाये रखना ठीक होता हैं | छोटे गांव से दिल्ली आयी हुई आशा इतनी सीधी और भोली थी कि सबको अपना समझती थी | और हमेशा से किराए के मकान में रहने की वजह से उसके जब भी अपने परिवार की कमी महसूस करती तो मकानमालिक आंटी से दो बातें करके दिल हल्का कर लेती | इस घर में कुल 2 महीने ही हुए थे आये हुए |
लेकिन फिर भी कभी अंकल के लिए शरबत बना ले जाती, कभी आंटी के गमलों में पानी डाल देती और अक्सर सब्जी 4 लोगो के हिसाब से बनाती | थोड़ी अपने लिए और थोड़ी नीतू आंटी और अंकल के लिए |
उसे अपने गांव से अभी भी इतना लगाव था कि घर में बैड होने के बावजूद एक छोटी सी चारपाई लगा के सोती ताकि उसके गांव की यादें हमेशा ताज़ा रहें | एक दिन नीतू आंटी को बोली – मुझे तो खटिया पर ही नींद आती है – नीतू आंटी की हसीं छूट गयी और वो बोली “खटिया ” व्हाट इज़ खटिया? वो देर तक उसका मज़ाक उड़ाती रही और वो भी भोली साथ में हंसती रही | नीतू आंटी मॉडर्न विचारों की पढ़ी लिखी औरत थी और हमेशा से बड़े शहर में रहने से उनका रहन-सहन भी मॉडर्न ही था |
रविवार का दिन था तो नवीन भी घर पर ही था | आशा आँखों में आंसू लिए घर आयी और उसी चारपाई पर जाकर बैठ गयी |
नवीन ने जब आशा को इस तरह देखा तो वो बोला -क्या हुआ? तुम रो क्यों रही हो ?
आशा बोली तुम ठीक कहते थे | अभी जब मैं नीतू आंटी के पास सब्जी देने गयी तो मैंने अपना नाम नीतू आंटी के मुँह से सुना और मेरे कदम दरवाजे तक न बढ़ पाए |
ये किसको किरायेदार रख लिया है | पता नहीं किरायेदार हो तो किरायेदार बन के रहो, हक़ क्यों ज़माने लग जाते हैं | आंटी ये कर दू वो आकर दू | ऑय डोंट नीड ऐनी हेल्प स्टिल …… गांव की गवार | हर दूसरे दिन सब्जी देने आ जाती हैं -पता नहीं कौन सा चीप ऑयल यूज़ करते हैं | ऑय ऑलवेज थ्रो इट इन गार्बेज|
आशा का दिल इन बातों से पसीज गया | नीतू आंटी ने शब्दों के ऐसे बाण चलाये कि आशा के आंसू रुक ना पाए | और आशा की कहानी सुनकर मेरा दिल भी भर आया और आपका ? क्या सचमुच किरायेदार किरायेदार ही होता है ?
चित्र स्त्रोत -navbharat times, OVO energy, IBtimesIndia

