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क्या है फिल्म राज़ी के पीछे का राज़?

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फिल्म राज़ी को हम सबने बहुत पसंद किया और इस फिल्म के लिए आलिया भट्ट को बहुत सराहा भी गया। पर क्या आप इस फिल्म के पीछे छिपी असली कहानी को जानते हैं? क्या आप जानते हैं की यह फिल्म हरिंदर सिक्का द्वारा लिखी गयी पुस्तक ‘कॉलिंग सहमत’ पर आधारित है? हरिंदर सिक्का  इंडियन नेवी के रिटायर लेफ्टिनेंट कमांडर हैं जिन्होंने एक बहादुर देशभक्त ‘सहमत’ की कहानी को जानने के लिए वो सब कुछ किया जो उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था।

नेवी से रिटायरमेंट के बाद हरिंदर एक जर्नलिस्ट का काम करने लगे और 1999 में एक एम्बेडेड जर्नलिस्ट के रूप में कारगिल युद्ध छेत्र में पहुंचे। वहां जाने पर वहां मौजूद ऑफिसरों से उनका पहला प्रश्न यही था की उन्होंने कारगिल की चोटियों तक कब्ज़ा किया कैसे?? कहीं हमारे अंदर ही कोई गद्दार तो नहीं छिपा?? तभी वहां बैठे एक अफसर ने कहा “हर कोई गद्दार नहीं होता, मेरी माँ गद्दार नहीं थी”। ये एक वाक्य हरिंदर सिक्का के दिमाग में बैठ गयी और वे उस युवा अफसर की इस बात के पीछे की कहानी को जानने के लिए जिज्ञासु हो गए।

उस अफसर के घर का पता लगा कर हरिंदर सिक्का वहां पहुंचे, उन्होंने दरवाज़ा खटखटाया और अंदर से एक महिला निकली। हरिंदर ने अपना परिचय दिया और उनसे बात करने की अनुमति मांगी पर महिला ने काफी विनम्रता के साथ उन्हें मना कर दिया। इसके बाद भी हरिंदर का जूनून कम नहीं हुआ और वे उस महिला से बात करने की कोशिश करते रहे।

काफी प्रयासों के बाद उस महिला ने उनसे बात करनी शुरू की और उन्हें उस महिला से कुछ बातें पता चली और आगे की बातों को जानने के लिए वे पाकिस्तान तक चले गए। वहां जाकर उन्हें पता चला की उस महिला की कहानी इंडियन इंटेलिजेंस की कहानी से मिलती जुलती थी। और इंडियन नेवी में होने की वजह से उन्हें यह पता था कोई पाकिस्तान से यह खबर भेज रहा था की पिएनइस गाज़ी विशाखापटनम के आस पास थी। यह सब बातें मिलाकर उन्हें सहमत की बातों की सच्चाई पता चल गयी। उन्होंने उस महिला से किताब लिखने की अनुमति मांगी जिसपर उन्की सेहमती मिल गयी। और अब बारी थी सहमत की इस कहानी को दुनिया के सामने लाने की जिसमे उन्हें 8 साल का वक़्त लग गया।

2008  में उनकी किताब ‘कॉलिंग सहमत’ लांच हुई जिसमें उन्होंने उस पूरी घटना का जिक्र किया गया है की किस तरह एक आम कश्मीरी लड़की एक जासूस बन गयी और अपने देश को बचाने के लिए अपनी जान को जोखिम में डाल दिया। हरिंदर ने इस  कहानी को इतना घुमा-फिराकर लिखा कि सहमत और उसके परिवार की पहचान न हो पाए।

सहमत देश की सेवा करने वाली वो महिला है जिनका असली नाम भी किसी को नहीं पता।  खुद देश के लिए अपना सब कुछ त्यागने वाली सहमत ने अपने बेटे को भी भारतीय सेना में भेजा। सहमत आज हमारे साथ इस दुनिया में नहीं हैं पर उनकी हिम्मत और त्याग को हमारा सलाम। इस फिल्म के द्वारा हम उनकी ज़िन्दगी के अहम् वक़्त को तो जान गए पर जो दिक्कतें उन्हें सहनी पड़ी वो सिर्फ वो ही जान सकती हैं।

जानिए सहमत की कहानी हरिंदर सिक्का की ज़ुबानी: