जानिये घर के मंदिर में मूर्तियां रखने के सही नियम

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मंदिर घर का वह विशेष स्थान है जहां भगवान को प्रतिष्ठित किया जाता है और नियमित रूप से उनकी पूजा अर्चना और प्रार्थना की जाती है। यह सब करना एक तरह का ध्यान ही है जो मनुष्य का ईश्वर के साथ संपर्क टूटने नहीं देता और उसे मानसिक और आध्यात्मिक बल प्रदान करता है। हर हिन्दू घर में पूजा घर की स्थापना ज़रूर होती है जिसे पूर्व या उत्तर पूर्व में स्थापित करना चाहिए।

पूजा घर के मंदिर में मूर्तियों को स्थापित करने के लिए कुछ विषेश नियम बनाए गए हैं। इन नियमों का उल्लेख न केवल हमारे वैदिक ग्रन्थों में है बल्कि वास्तु शास्त्र भी इस पर कई उपयोगी बातें बताता है। आइये जानते हैं क्या हैं ये नियम-

 

1)सर्वप्रथम और सबसे आगे रखें गणेश जी को

गणेश जी को अपने घर के मंदिर में सबसे पहला स्थान दें। क्यूंकि शास्त्रों के अनुसार गणेश जी का देवताओं में पहला स्थान है और किसी भी पूजा से पहले गणेश जी का आह्वान किया जाता है।  माना जाता है कि केवल गणेश जी ऐसे देव हैं जो ध्वनि की भाषा को समझते हैं और उसे प्रकाश के रूप में बदल सकते हैं जबकि अन्य देवता केवल प्रकाश की भाषा को समझते हैं और इसलिए गणेश जी ही उन तक आपकी बात पहुँचाते हैं।  यह भी कहा गया है कि यदि गणेश जी आप से प्रसन्न हो गए तो बाकी देवता अपने आप मान जाते हैं इसलिए उन्हें मंदिर में अग्रिम स्थान दें।

 

2)इष्ट देव, कुलदेवी एवं कुलदेवता का विशेष स्थान

इष्ट देव और देवी को इच्छाओं की पूर्ति करने वाला माना जाता है। गणेश जी के तुरंत बाद अपने इष्ट देव या कुलदेव / देवी की स्थापना करें। ये ईश्वर का वह रूप हैं जिन्हें आपके पूर्वजों ने अपना रक्षक माना था और इसलिए मंदिर में इनका स्थान गणेश जी के बाद आना चाहिए।  

 

3)अलग अलग मूर्तियों को रखने की शंकु व्यवस्था-

गणेश जी और इष्टदेव या देवी के साथ साथ मंदिर के अंदर विभिन्न देवी देवताओं को रहने के लिए शंकु या कोन के आकार को सर्वोत्तम माना गया है। इसमें एक निश्चित क्रम के अंदर सभी मूर्तियों को स्थापित किया जाता है। बायीं तरफ ईश्वर का पुरुष रूप तथा दायीं ओर स्त्री रूप रखा जाता है। कोन की नोक को अपनी तरफ रखते हुए सर्वप्रथम गणेश जी तथा उसके बाद इष्ट या कुलदेव बायीं ओर तथा कुलदेवी दायीं ओर स्थापित करें। इसके बाद दिये गए चित्र के अनुसार बाकी देवताओं और देवियों को क्रम में स्थापित करें। कोन के अंत की सबसे चौड़ी जगह पर सृष्टि के आधार ब्रह्मा, विष्णु और महेश या शिव की स्थापना की जाती है। जितनी भी मूर्तियाँ आपके मंदिर में हों उन्हें क्रमश इच्छाशक्ति, कर्मशक्ति और ज्ञान के प्रतीक अवतारों के क्रम से लगाएँ।  यह व्यवस्था इस बात की ओर भी इशारा करती है कि कोन की नोक गणेश जी के साथ ईश्वर के सगुण रूप को दिखाती है जबकि इसका चौड़ा होता हुआ हिस्सा सम्पूर्ण सृष्टि के आधार त्रिदेवों के साथ निर्गुण रूप की तरफ इंगित करता है। किसी भी व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास के लिए सगुण से शुरू होकर निर्गुण स्वरूप की यात्रा आवश्यक है ताकि वह सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त ईश्वर के साथ एकात्म स्थापित करने के लक्ष्य को पा सके।

 

4)ईश्वर के किस रूप को किस दिशा की ओर रखें-

ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा विष्णु एवं महेश तथा कार्तिकेय और सूर्यदेव को मंदिर के अंदर पूर्व दिशा में इस तरह स्थापित करें कि इनकी दृष्टि पश्चिम की तरफ पड़े।  अगर शिव लिंग की पूजा करते हों तो इसे उत्तर की ओर मुंह करके रखना चाहिए यानि शक्ति उत्तर की तरफ रहे। गणेशजी, दुर्गा माँ और भैरव की दृष्टि उत्तर से दक्षिण की ओर पड़नी चाहिए। इस तरह से मूर्तियों की स्थापना के विशेष परिणाम मिलते पाये गए हैं।

फिर भी यदि आप के पूजाघर में किसी कारणवश इस तरह से मूर्तियाँ स्थापित ना की जा सके तो उत्तर पूर्व की दिशा में सभी देवी देवताओं को बिना किसी संकोच के प्रतिष्ठित किया जा सकता है।

 

चित्र श्रोत:  https://commons.wikipedia.org, www.freedomainpictures.com,  www.mikipedia.org, www.pixbay.com,  www.hindujagruti.org  www.pexels.com, https://www.hindujagruti.org/hinduism/arrange-deities-home-temple, https://www.boldsky.com/yoga-spirituality/faith-mysticism/2015/how-to-keep-idols-in-pooja-room-068900.html

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