Home / Uncategorized / हर औरत की कहानी – क्या आप भी सिर्फ दूसरों के बारे में सोचती हैं ?
क्या देख रहे है ? रसोई की बिलकुल वैसी ही हालत है जैसे घर में सुबह होती है ! इसका ब्रेकफास्ट, उसका लंच, इसकी चाय, उसका दूध.. बस यही चलता है | घर के सब लोग यही सोचने लग गए है कि मेरे चार हाथ है | एक से शर्ट प्रेस करें, एक सब्जी बनाने के लिए, एक सबका खाना पैक करने के लिए और एक बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने का भी तो था | और मैं भी यही मान चुकी थी कि घर में सबकी जरूरतों का ख्याल रखना मेरी जिम्मेदारी हैं |
कितने सालों मैंने सबका ध्यान रखा |
आशीष तो हर वक़्त यही बोलते कभी खुद भी कुछ खा लिया करों, हर वक़्त दूसरों के लिए बनाती रहती हो | लास्ट की रोटी ठीक नहीं बनी, कोई नहीं मैं खा लूंगी ! सब्जी कम पड़ गयी ? बाकी सबको पूरी हो जाये, मैं तो दही से खा लूंगी ! ऐसी छोटी-छोटी अड़जस्टमेंट्स तो हज़ारो बार की थी | कभी-कभार अपने शरीर को तंदरुस्त रखने का भूत सवार हो जाएं तो ठीक 2 दिन प्रॉपर खाना, एक्सरसाइज और अपने लिए समय निकाल लेती लेकिन तीसरे दिन फिर वही हालात | आशीष ऑफिस से आये हैं -उनके लिए कुछ स्नैक्स बनाऊ या फिर अपनी एक्सरसाइज में टाइम वैस्ट करती ? यहाँ तक कि एक दिन मैंने बच्चों को एप्पल काट के दिया और साथ ही एक केले को उठाया, नमक, निम्बू लगाया और अपने लिए लेके आयी | तभी मेरा छोटा बेटा बोला – मम्मी, मुझे केला खाना था | और ये गयी प्लेट उसकी तरफ | अब अपने लिए कुछ बनाना हो तो आलस बिन बुलाये आ जाता हैं | सोचा, छोड़ो रात के खाने का भी तो टाइम हो रहा हैं |
ये रोज की भाग-दौड़ चलती रही ना जाने कितने साल कि अचानक एक दिन मुझे सीने में दर्द होने लगा |
मझे लगा गैस हो रही हैं लेकिन वो कुछ और ही था | डॉक्टर से चेक-अप करवाया तो उसने बताया इनकी 80 % आर्टरीज़ ब्लॉक हैं | बाई-पास सर्जरी होगी |
और मेरा ऑपरेशन सक्सेसफुल हो गया | फिर तो पता नहीं कितने दिनों में कोई काम ना कर पायी | आशीष कुछ दिन तो बच्चों को भी देखते रहे, घर के छोटे-छोटे काम भी करते रहे, अपना ऑफिस भी लेकिन गुस्सा उनके चेहरे पर दिखाई देने लगा |
मेरी हालत इतनी ठीक नहीं थी लेकिन एक दिन आशीष के अंदर दबी चिड़चिड़ाहट शब्दों के रूप में बाहर निकल आयी – अरे क्या-क्या देखूँ ? इंसान हूँ, बच्चों का भी मैं ही देखूँ… और तुम्हारा भी …. बोलते-बोलते चुप हो गए | जैसे गलती से बोल दिया हो लेकिन मैंने तो सुन लिया !
उसके बाद बोले वो -बुरा मत मानना,मेरा वो मतलब नहीं था | लेकिन आशीष की एक बात मेरे लिए ज़िन्दगी भर का सबक बन गयी | क्या क्या देखूं ? इंसान हूँ ! ये शब्द मेरे दिलो-दिमाग में घर कर गए | अगर इतना काम एक इंसान नहीं कर सकता तो क्यों मैं अपने आप को खत्म कर, दूसरों की ज़िन्दगी सवार रही थी |
उस दिन मैंने महसूस किया -जब तक आप दूसरों की उम्मीदों को पूरा कर रहे हैं तब तक सब ठीक हैं लेकिन जहा थोड़ी सी ऊच-नीच हो गयी, जो किया सो खत्म | जितनी हो सके सिर्फ उतना काम करें ! कोई मैडल नहीं मिलेगा लेकिन निंदा हो सकती हैं | और एक बहुत ही जरूरी बात सबको खुश रखना, सबकी हेल्थ का ध्यान रखना बेहद जरूरी हैं लेकिन सबसे पहले अपना ध्यान रखना जरूरी हैं | अगर आपकी हेल्थ नहीं तो अपनों का ख़याल कैसे रखेंगे? और अगर आप अपना साथ छोड़ेंगे तो शरीर भी आपका साथ छोड़ने लगेगा |
और एक और बात बता दूँ – जितना काम हम औरते कर सकती हैं, आदमियों को एक दिन भी करना पड़ जाएं तो धरती ऊपर और आसमान नीचे आ जायेगा !
चित्र स्त्रोत -Huffington post,grasping for objectivity, kevinmd.com, NRI cafe.com, inspired angela.word press, hinduism today
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