Home / Uncategorized / आसमान का हिस्सा लेकिन सोच जमीन पर
गायत्री ने ससुराल में पहला कदम रखा तो बिलकुल माँ जैसी सास उसके आगे पूजा की थाली ले कर आ गयी और गायत्री के चेहरे पर जो डर और घबराहट थी वो एक बड़ी सी मुस्कान में बदल गयी | गायत्री अपने पति को तो धीरे-धीरे समझ गयी | गायत्री ने सोचा कि एक पति के बाद सास ही होती जिससे अगर निभ जाए तो ज़िन्दगी खुशाल रहती है | नीलेश तो एक सभ्य, समझदार और सुलझे हुए इंसान है और अगर सास जैसा बर्ताव कर रही हैं अगर वैसी ही है तो मैं बहुत भाग्यशाली हूँ |
शादी को अभी कुछ ही दिन हुए थे कि सास आकर बोली सबसे सुन्दर साड़ी और गहने पहनकर 8 बजे तक तैयार हो जाओ और हां थोड़ा पल्ला सर पर रखना | किसी के यहाँ फंक्शन पर जाना है | वहां सब के पैर छूना और कोई फ़ालतू बात नहीं | ये सुनकर थोड़ा अजीब लगा लेकिन मैं तो किसी और ही दुविधा में थी | पंजाबी घर में पली बड़ी हुई तो ज्यादातर माँ को सूट पहने ही देखा | अब ना मुझे साड़ी पहनना पसंद था और ना ही बांधना आता था | पर जब सास ने कहा तो मैने जी कह कर सर हिला दिया |
जब मैने साडी निकाली तो यही सोचती रह गयी कि कोई इतनी लम्बी साड़ी पहनता कैसे होगा | सोचा यू ट्यूब पर कोई वीडियो देख लेती हूँ कि साड़ी कैसे बांधे ?
जब पल्लू को पकड़ू तो कमर से निकल जाएं और जब कमर से कसु तो पैरों के नीचे आये | जब 8 बजे तक मैं तैयार होकर नहीं आयी तो सासु माँ ही मेरे कमरे में आ गयी | ये क्या ? तुम अभी तक तैयार नहीं हुई – सासु माँ ने बुलंद आवाज़ में कहा | जी, मुझे साड़ी बांधना नहीं आता – मैने दबी आवाज़ में कहा | मम्मी ने साड़ी बांधना तक नहीं सिखाया और ये कोई रंग हैं साड़ी का, दहेज में कोई ऐसे रंग की साड़ी होती है- कोई लाल, कोई गुलाबी, नयी दुल्हन को ऐसे रंग फबते हैं |
मुझे बुरा लगा लेकिन मैने कुछ ना कहा | और सासु माँ ने साड़ी पहनने में मेरी मदद की | फंक्शन पर पहुंचे तो सब सासु माँ को बोलने लगे – ये क्या बहु को पल्ला लेकर साड़ी पहनवायी है |
उस पर सबके सामने मेरी सास बोली – पता नहीं, इसे ऐसे ही अच्छा लगता है | मैं तो हैरान ही रह गयी |
उसके बाद तो मेरी सास का असली रूप सामने आया ,मेरी हर बात पर हिदायत, ताने और दखलंदाज़ी करना जैसे उनका जन्म सिद्ध अधिकार हो | बड़ी बिंदी लगाओ, नहाने के बाद गीले बाल खुले छोड़कर सबके सामने मत आओ, ये मत पहनो, वो मत पहनो, सिन्दूर पूरा बालों में ढक रहा है, सबको खाना खिलाकर खाओ, गर्मी में भी भारी-भरकम साड़ी पहनो और भी ना जाने क्या-क्या | मैं भी चुपचाप सब सहती रही | सोचा बोलूंगी तो लड़ाई के सिवा कुछ नहीं होगा | नीलेश तो मेरा पूरा ध्यान रखते हैं ना | पानी तब सर के ऊपर हो गया जब मेरी सास ने मेरे माँ-बाप के लिए बोलना शुरू किया | माँ ने ये भी नहीं सिखाया, इतना भी नहीं पता, पीछे से कुछ तो सीख के आती – ऐसे ना जाने कितने ताने मैं हर रोज सुनती थी | रोज-रोज की जिल्लत से दिल में गुब्बार भर तो रहा ही था और तब जाकर फटा जब मेरी सास ने अपनी बहन को मेरे सामने ये कहा 
– क्या लायी, कुछ नहीं, सर्वेश (नीलेश के बड़े भाई) की शादी में तो वर्ना कार आयी थी |
इसके मम्मी-पापा से तो ये भी नहीं दिया गया |
मैने आव देखा ना ताव, सोचा अब तो मुझे बोलना ही पड़ेगा | दोनों बहनों की बात को काटते हुए मैने कहा मैने अपने मम्मी-पापा को पहले ही बोला था कि कही भी शादी करना लेकिन गरीब घर में नहीं | दोनों भौचक्की रह गयी | इस पर सासु माँ बोली -क्यों हम गरीब हैं? किस चीज़ की कमी हैं तुझे?
मुझे नहीं, आपको है एक कार की कमी, तो हुई ना गरीब तभी तो मांग रहे हो | भगवान का दिया सब हैं बस एक कार की कमी है| मांगने वाले को और क्या कहते हैं मुझे और कोई शब्द नहीं सूझ रहा | मेरी सास इतनी पानी-पानी हो गयी कि फिर मुझे कभी भी कुछ भी गलत सुनाने की हिम्मत ना हुई | वो कहते हैं ना जिन लोगो की सोच छोटी होती है वो कितने भी बड़े आसमान का हिस्सा क्यों ना बन जाएं ,सोच जमीन पर ही रहती है!
चित्र स्त्रोत -Utsavpedia, youtube, patrika,HT
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