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सम्मान तक रखा गिरवी

Parul Sachdeva | दिसम्बर 11, 2018

कोई रखता है जमीन गिरवी

कोई रखता है मकान गिरवी

एक बेटी को खुश देखने के लिए

कई माँ-बाप तो रख देते है सम्मान तक गिरवी

मेरी एक नाज़ो से पली बेटी थी “आस्था”| जो बेटी मेरी ऊँगली पकड़ चलना सीखी आज मुझे उसके नाम के आगे थी लगाना पड़ रहा है | भगवान् ऐसा दिन किसी बाप को ना दिखाए | सच कहते है मन की बात कह देने से फैसले हो जाते है और मन में रख लेने से फासले हो जाते है | मेरी बेटी ने इस बूढ़े बाप को कभी अपने दिल का हाल नहीं बताया | आज भी जब आँखे बंद करता हूँ तो आस्था का खिलखिलाता चेहरा सामने आता है, कभी उसके माथे में तनाव की लकीरे नज़र ही नहीं आयी मुझे | और आज इतना फासला है हम दोनों के बीच कि दुनिया का कोई वाहन उसे पूरा नहीं कर सकता | मेरी छोटी बेटी को सब बताती वो, लेकिन दोनों ने मुझे इन गंभीर बातों को आभास तक नहीं होने दिया | उन्हें लगता पापा को दिल की बिमारी है, कही उन्हें कुछ ना हो जाएं | पर बेटी, आज जो मेरा दिल मेरी छाती चीर के बाहर पड़ा है, उसका क्या ?

एक बार बोलती, वो लोग ख़ुशी का पता भूल जाते जिन्होंने मेरी बेटी को दुखो की सेज पर सुला दिया | आस्था एक बहुत ही सौम्य, समझदार और सुलझी हुई लड़की थी | पर एक कमी थी उसमे – जुबानदराज़ी करना नहीं सिखाया उसे मैंने, जरुरत से ज्यादा सीधा होने पर दुनिया बहुत टेढ़ी हो जाती है |

बहुत ही अच्छे परिवार में शादी की मैंने उसकी | एक साल तक हर ख़ुशी उसके कदम चूमती, और उसकी ख़ुशी से चहकती आवाज़ मेरे वीरान घर को आबाद कर जाती | मैं सोचने लगा, मैं तो धन्य हो गया अपनी बेटी के लिए ऐसा घर पाकर |

लेकिन गलती शायद बहुत हद तक मेरी भी थी, एक साल बात बहुत बार आस्था ने बातों-बातों में कहा – गाड़ी नहीं है, या संजय को बिज़नेस बढ़ाने के लिए पैसो की जरुरत है और शायद ऐसा कई बार हुआ | मैंने हर बार कहा -जो मेरा है, वो तेरा है बेटा, बता क्या प्रॉब्लम है ? मुझे लगता था कि मैं उसकी मुश्किलें आसान कर रहा हूँ लेकिन मुझे नहीं पता था कि ये सब उसके ससुराल की मांगे थी जिसके लिए उसे वो हर पल परेशान कर रहे थे |

सिर्फ इतने से उनका दिल नहीं भरता था | उन्होंने मेरी बेटी को शारीरिक रूप से भी परेशान किया जिसका पता मुझे “समय हाथ से निकल जाने ” के बाद चला | उसे छोटी सी भूल करने की भी इतनी बड़ी सजा दी जाती कि उसका एक वक़्त का खाना बंद कर दिया जाता | कई बार तो उसे घरवालों की झूठन खाने को भी मजबूर किया जाता | और फिर भी उन वैशियों के दिल में ठंडक ना पहुँचती तो उसे मारने में भी कोई झिझक महसूस नहीं होती उन्हें |

पर उस दिन… उसने एक आखिरी बार मुझे फ़ोन किया.. और वो भी इसीलिए हो पाया क्योंकि मेरा नंबर आस्था स्पीड डायल पर रखती थी.. सिर्फ एक हेलो शब्द कानों तक पहुंचा लेकिन उस हेलो में एक कपकपीं… एक दहशत… एक डर..एक चीख… एक अनंत दर्द.. एक पुकार..थी | लेकिन मैं एक ऐसा बदनसीब बाप था जो समय पर नहीं पहुंच पाया | जब तक मैं उसके घर पंहुचा वो एक पार्थिव शरीर बन चुकी थी |

उसका शरीर बुरी तरह जला हुआ था और खून से लतपत था क्योंकि उसे जलाने के बाद तीसरी मंज़िल से धक्का दिया गया था | ससुराल वाले कहते है – आपकी बेटी का मानसिक संतुलन ठीक नहीं था, इसीलिए उसने जल कर आत्महत्या कर ली | आज भी उन पर केस चल रहा है और उनका पूरा परिवार जेल में है | मैं इस लड़ाई में हार नहीं मानूंगा, अपनी बेटी की मौत को यु ज़ाया नहीं होने दूंगा | लेकिन इन सब में मुझे क्या मिला ” वक़्त ने दी है मुझे ऐसी सजा.. अब तक़दीर से कैसे पूछू मेरी गलती क्या है “?

 

चित्र स्त्रोत -pinterest

 

Parul Sachdeva

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