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शोषण जो शरीर पर नहीं आत्मा पर दिखता है

Parul Sachdeva | सितम्बर 6, 2018

आलू- 25 के

प्याज- 30 के

गाजर -40 की

मटर -30 के

ये तो हुए 125, मेरे पास तो 150 रुपये थे | बाकी के कहाँ गए? कुसुम ने चलते- चलते अपने मन में हिसाब लगाते हुए सोचा |

तभी सब्जी वाले की आवाज़ आयी- दीदी ये खीरा और धनिया यही छोड़ कर जा रहे हो ? कुसुम अपने सर पर हाथ मारते हुए उन्ही पैर वापिस आयी और गलती से छूटी सब्जियों को उठाया |

कुसुम पहले ऐसी ना थी | कामकाजी थी, पैसो को लेकर इतनी फ़िक्र भी ना थी लेकिन जब से शादी हुई उसकी जैसे दुनिया ही पलट गयी | कुसुम का पति उससे पाई-पाई का हिसाब लेता था |

यहाँ तक कि एक बिंदी का पत्ता खरीदने के लिए भी उसे अपने पति से पैसे मांगने पड़ते थे तो ऐशो-आराम की तो बात ही छोड़ दो | कुसुम को जॉब करने की इजाजत नहीं थी | लेकिन कुसुम का पति जब ऑफिस में औरतों को काम करता देखता तो कुसुम पर घर आकर जरूर ताना मारता – मेरे ऑफिस में आकर देखो कितनी मॉडर्न हैं आजकल की औरतें | घर भी देखती हैं और ऑफिस में भी सबसे आगे | और तुमसे तो घर की जिम्मेदारियां भी ठीक से नहीं निभायी जाती |

सिर्फ पैसे की खिच-खिच नहीं थी बल्कि हर काम की जिम्मेदारी सिर्फ कुसुम पर थी | मोटर बंद नहीं की ? कुसुम की गलती है ! खाना टाइम से नहीं बना- कुसुम क्या कर रही थी ? बच्चो की स्कूल से शिकायत आयी -ये तो कुसुम को देखना था ! कुसुम कुसुम कुसुम जैसे हर गलती, हर जिम्मेदारी हर काम पर एक ही नाम लिखा था -कुसुम!  

घर में कुसुम है तो कामवाली का क्या काम | बच्चे और मैं तो सुबह ही ऑफिस चले जाते हैं | पीछे से काम ही क्या होता है सोना और खाना | कितनी ही बार कुसुम ने ऐसी बातें अपने पति के मुँह से सुनी, दोस्तों के सामने उसकी खिल्ली उड़ाते या फिर रिश्तेदारों को बताते हुए | शब्द अपनी सुविधाअनुसार बदल जाते लेकिन मतलब वही होता | “किसी काम की नहीं है कुसुम “| जैसे कुसुम के माँ-बाप के सामने ” मैंने तो कहा है, रख लो कामवाली, पर कहती बच्चे और आप तो सुबह ही चले जाते हो, काम ही क्या है मेरे पास? खा-खा के मोटा थोड़े ही होना है मैंने |

दोस्तों के सामने – शी हेज़ डन बैचलर्स इन हाउसहोल्ड वर्क – और बहुत तेज तेज हंस के खिल्ली उड़ाने लगता | उसको कभी भी ये महसूस ना होता कि कुसुम के किचन तक उसकी आवाज जाती है | और गैस पर रखे दूध में आने वाले उफान की तरह कुसुम को भी हर पल ऐसा ही महसूस होता था |

एक दिन पति देव को ऑफिस से लेट आना था | कुसुम ने बच्चो को 8 बजे खाना खिला सुला दिया और टीवी का रिमोट लेकर बैठ गयी | कुसुम को ये मौका शायद कई महीनों बाद मिला था | जब टीवी का रिमोट उसके हाथ में था ताकि वो अपना पसंदीदा चैनल लगा सके | एक चैनल से दूसरे चैनल बदलते बदलते कुसुम क्राइम पैट्रॉल सीरियल पर आकर रुक गयी जिसमे एक पति अपनी पत्नी का शारीरिक शोषण करता है | और अंत में नैरेटर कहता है अगर आपके साथ या आपके पास ऐसा कुछ हो रहा हो तो चुप ना बैठे, आवाज़ उठाये |

कुसुम गहरी सोच में डूब जाती है कि उसके साथ ऐसा कुछ नहीं हो रहा लेकिन जो हो रहा है वो उससे भी बदतर है क्योंकि हर पल की ज़िल्लत उसे अंदर से तोड़ रही थी | उसे लग रहा था मेरा क्या अस्तित्व है ? क्या मैं खाना बनाने, बच्चों और पति की देखभाल के लिए हूँ | वो सोचने लगी मैं वो भी ख़ुशी से कर लूंगी, क्रेडिट ना मिले लेकिन ऐसा तो ना हो कि सबके सामने ये दिखाया जाए कि मेरी कोई वैल्यू ही नहीं |

दोस्तों, हमारे समाज में ऐसे बहुत से लोग हैं जिनके साथ मानसिक शोषण होता है | और मानसिक शोषण एक जहर है जो शरीर पर नहीं दिखता लेकिन आत्मा पर इसके निशान साफ़ दिखाई देते हैं |

अगर आप मेरी इस बात से सहमत हैं तो अपनी राय हम तक जरूर पहुंचाए |

 

चित्र स्त्रोत – videoblocks,Pymnts.com,the people space,the quint,collider

Parul Sachdeva

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