गर्भाशय हटाने के जोखिम और दुष्प्रभाव

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गर्भाशय को हटाने की प्रक्रिया को हिस्टरेक्टॉमी के रूप में जाना जाता है। गर्भाशय के साथ, अंडाशय और फैलोपियन ट्यूब जो की अंडाशय से अंडे लेते हैं, इन्हें भी डॉक्टर की सलाह पर शरीर से हटा दिया जा सकता है। गर्भाशय हटाने की सबसे आम प्रक्रिया गर्भाशय फाइब्रॉएड है। आजकल महिलाओं में इस तरह की समस्याएं बढ़ती जा रही है और इसलिए गर्भाशय को हटाने के जोखिमों और परिणामों के बारे में पूरी तरह से समझना आवश्यक है।

 

डॉक्टर हिस्टरेक्टॉमी का सुझाव क्यों देते हैं?

5 – 7 cm तक फाइब्रॉइड के आकार में वृद्धि के कारण गर्भाशय को हटाने की सलाह दी जाती है। मान लीजिए की कोई महिला अपने रजोनिवृत्ति या मेनोपॉज़ के करीब है, तो उसे अवलोकन के तहत रखा जा सकता है और उसके बाद गर्भाशय हटाने की प्रक्रिया पर निर्णय लिया जा सकता है क्योंकि जब वह रजोनिवृत्ति से गुज़रती है, तो फाइब्रॉइड जल्द ही कम होने की आशंका रहती है।

गर्भाशय हटाने के लिए दूसरा कारण यूटरस की लाइनिंग का मोटा होना। मान लीजिए की इस स्तिथि में आपके डॉक्टर को निकट भविष्य में कैंसर होने के लक्षण नज़र आते हैं तब वह आपको गर्भाशय हटाने के लिए सलाह देंगे।

तीसरा कारण डिम्बग्रंथि है। जब अंडाशय बड़े होते हैं तो इन्हें गर्भाशय के साथ सुरक्षा बरतने के लिए हटा दिया जाता है लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि जब गर्भाशय को हटा दिया जाता है तो अंडाशय को भी हटा दिया जाना चाहिए क्योंकि यह महिलाओं के दिल और हड्डियों से सम्बंधित कार्यो में एक प्रमुख भूमिका निभाता है।

अन्य कारणों में गर्भाशय में असामान्य रक्तस्राव, क्रोनिक श्रोणि का दर्द, श्रोणि के अंगों में प्रकोप आदि शामिल हो सकते हैं। 

एक हिस्टरेक्टॉमी से गुजरने से पहले इसके कुछ जोखिमों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है – कुछ रोगियों में भारी रक्तस्राव, योनि में सूखापन, वज़न में वृद्धि हो सकती है और गर्भाशय के आस-पास के अंग भी घायल हो सकते हैं, कामेच्छा का नुकसान हो सकता है और मूत्र रिसाव हो सकता है।

 

हिस्टरेक्टॉमी के बाद के साइड इफेक्ट्स –

1) खून बहना या ब्लड क्लॉटिंग  

2) बाल झड़ना

3) तेज़ सांसों की समस्याएं

4) कब्ज़

5) मूत्राशय में जलन

6) शरीर गरम होना

7) यूरिनरी इन्फेक्शन के कारण बुखार

8) तनाव और चिंता

9) डिप्रेशन

10) कामेच्छा में कमी

 

हिस्टरेक्टॉमी के बाद रोगियों को पर्याप्त खुराक के साथ उनकी देखभाल करना आवश्यक है, इसके अलावा रोगी को समय के साथ पूर्ण इलाज के लिए मनोवैज्ञानिक तौर पर भी तैयार किया जाना चाहिए।

हिस्टरेक्टॉमी  की प्रक्रिया तीन अलग-अलग तरीकों से की जा सकती है – लैप्रोस्कोपिक हिस्टरेक्टॉमी,

वजाइनल और एब्डोमिनल हिस्टरेक्टॉमी। हालांकि, यह आवश्यक नहीं है कि आपको सभी गर्भाशय संबंधी मुद्दों के लिए हिस्टरेक्टॉमी का ही सहारा लेना पड़े, गर्भाशय से संबंधित मुद्दों को ठीक करने के अन्य वैकल्पिक तरीकों के लिए भी अपने डॉक्टर से अवश्य परामर्श करें। वे पूरे गर्भाशय को हटाने के अलावा या इस प्रक्रिया से पहले कुछ अन्य दवाओं, प्रक्रियाओं और इंजेक्शन के लिए सुझाव दे सकते हैं।

चित्र स्त्रोत – pixabay

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