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जब प्रेगनेंसी दस्तक देती है तो शर्म खिड़की से बाहर चली जाती है !

Parul Sachdeva | अक्टूबर 15, 2018

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hindi Personal Story

जब प्रेगनेंसी दस्तक देती है तो शर्म खिड़की से बाहर चली जाती है !

ये बेटियाँ तो माओ की रानियाँ है.. मीठी मीठी ये प्यारी कहानियां है.. FM पर गाना चल रहा था जब निशा आज आखिरी चेक-अप के लिए अपने भाई दिवेश के साथ डॉक्टर के पास जा रही थी | जैसे ही दिवेश ने चैनल बदलने के लिए हाथ आगे बढ़ाया तो निशा ने उसे कहा -इसे चलने दे |

निशा का सपना था कि उसे बेटी हो | बेटियाँ प्यारी ही इतनी होती हैं |

दरसल निशा और आदिल शादी होने के बाद से विदेश में ही जाकर बस गए थे | यहाँ इंडिया में उन दोनों की पूरी फैमिली थी | जैसे ही घर में किलकारी गूंजने की खबर आयी तो घरवालों ने निशा और आदिल को वापिस इंडिया आने की सलाह दी | निशा और आदिल को भी ये लगने लगा कि बाहर परदेस में उसकी और बच्चे की देखभाल करने के लिए कोई नहीं है | 6 महीने तो दोनों ने ही सिंगापुर में ही काटे फिर जब निशा की डॉक्टर ने उसे ट्रेवल करने की इजाज़त दे दी तो आदिल निशा को इंडिया छोड़ गया |

जब तक आदिल कंपनी से रिजाइन करने के काम में लग गया |

निशा को डॉक्टर ने नवंबर के पहले हफ्ते की डिलीवरी डेट दी | वजन थोड़ा ज्यादा होने के कारण निशा को ऑपरेशन करने की सलाह दी | सभी बस बच्चे और माँ की खैरियत चाहते थे तो किसी ने भी आना-कानि नहीं की | और निशा भी किसी दर्द की चिंता किये बिना बस उन नन्हे कदमो के इंतज़ार में थी जो उसके दिल पर सबसे बड़े निशान छोड़ जायेगा |

1 नवम्बर को निशा ने एयरपोर्ट पहुंच कर आदिल को सरप्राइज दिया | और अगले ही दिन सुबह-सुबह निशा वाटर ब्रेक होने की वजह से हॉस्पिटल पहुंच गयी | निशा इस बात से बेहद खुश थी कि आदिल इस समय उसके साथ था पर निशा एक बात से बिल्कुल अनजान थी….

ऑपरेशन के लिए ले जाते हुए उसे सिर्फ एक नाम मात्र का गाउन पहनाया गया | नाम मात्र इसीलिए कहा क्योंकि पीछे से पूरा खुला था | ये तो फिर छोटी बात थी, प्रेगनेंसी चेक-अप के दौरान ना जाने कितनी बार अपनी डॉक्टर और नर्स के सामने कपड़े उतारे और पहने गए तो शर्म जरा खिड़की से बाहर चली ही गयी थी | ऑपरेशन थिएटर में जैसे ही निशा को ले जाया गया वहा “ॐ भूर्व भवा स्वहा” भजन सुन निशा को थोड़ी राहत मिली लेकिन डर की वजह से शरीर में एक अलग से कंपकंपी बरकार थी | ऑपरेशन शुरू होने से पहले निशा ने महसूस किया कि उसके बदन पर एक भी कपडा नहीं था और चारो ओर लेडी डॉक्टर्स, जेंट्स डॉक्टर्स, वार्ड बॉय उसके शरीर को घेरे हुए थे |

कहा जाता है कि डॉक्टर के लिए एक मरीज सिर्फ एक बीमार होता है, आदमी या औरत नहीं पर निशा एक औरत थी और उसका शरीर हर औरत की तरह शर्म और हया का मोहताज था |

आप एक दम सीधा बैठो, कमर को स्ट्रैट रखो – तभी एक जेंट्स डॉक्टर की आवाज़ आयी | आप हिले नहीं, नहीं तो मुझे आपकी स्पाइनल कॉड में ये इंजेक्शन फिर से लगाना पड़ेगा |

इंजेक्शन लगते ही निशा की बॉडी तो नम हो गयी लेकिन दिमाग नम नहीं था | चाहे मुँह के बाद से हरा पर्दा लगाया हुआ था ताकि पेशेंट को कुछ ना दिखे | मगर वो सब सुन पा रही थी | सभी डॉक्टर्स एक दूसरे से बातचीत करने में व्यस्त थे |

तुम्हारी बेटी का एडमिशन हो गया डीपीएस में ?

हां, मैनजमेंट कोटे में हुआ है, ऐसे तो ये मान ही नहीं रहे थे |

एजुकेशन सिस्टम को भी बिज़नेस बनाया हुआ है ! सच है !

अरे भाई, तुमने भी तो मेडिकल प्रोफेशन को बिज़नेस बनाया हुआ है,

मेरे शरीर की 7 लेयर काट रहे हो, थोड़ा सा यहाँ भी ध्यान दो, बातें बाद में भी हो सकती है -निशा के पत्थर शरीर ने सोचा |

निशा को अजीब सा डर लग रहा था कही बातों-बातों में कोई सामान ही उसके पेट में ना छोड़ दे | छोटे-छोटे तो होती है कैंची और बाकी टूल्स | कि तभी उसे ऐसा लगने लगा जैसे कोई फटी हुई शर्ट को सिलता है उसी तरह उसकी भी सिलाई शुरू हो गयी है | लेकिन ये क्या? ऑपरेशन हो गया ? कोई बातयेगा मुझे कि मेरा बच्चा कैसा है ? कोई रोने की आवाज़ नहीं आयी ? वैसे तो 2 मिनट की ही देरी थी लेकिन अपने बच्चे की खैरियत जानने में 2 मिनट की देरी कई जन्मो जैसी लगी उसे |

ये देखिये आपको बेटी हुई तभी डॉक्टर ने एक खूबसूरत सी गुड़िया को मुझे दिखाया |

निशा अपनी बेटी को देख सब कुछ भूल गयी… बस एक चीज़ अपने मन में बोली -शुक्र हैं ! मेरा ऑपरेशन हो गया  !

 

चित्र स्त्रोत –Youtube,best health magzine,bustl, the healthy home economist